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अपना कोई कोना-२

इस धरनी के बृहद परिधि से,

दूर गगन के अनंत क्षितिज तक,

कौन सा कोना..?

मुक्त भाव से सब कुछ मेरा,

मैं सबका हूँ,कैसा कोना,

कौन सा कोना..?

बस सब मन की अभिलाषा है,

स्वयं बनाई परिभाषा है,

फिर काहे को, कैसा रोना,

खुला आसमां,

क्षितिज समंदर,

वृक्ष तले ही अपना कोना…🙏

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अपना कोई कोना..

अब चाह नही अपने कोने की,

कुछ पाने की,कुछ खोने की,

मोह पाश सब टूट चुका अब,

दुनियां पीछे छूट चुका अब,

अब अपना कोना,

अपने अंदरजब से मन ये हुआ कलंदर…

अब चाह नही अपने कोने की,

कुछ पाने की,

कुछ खोने की।

Photo by Julia M Cameron on Pexels.com
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