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जरूरी है क्या?

प्रेम करना और बोलना,

जरूरी है क्या,
जब लोगो ने #प्रेम को,
बोलना शुरू किया,

प्रेम फीका होता चला गया,

वो क्या #प्रेम ,
जिसे जताना पड़े,
करता हूँ मैं तुमसे ,
बताना पड़े,

प्रेम तो बस चेहरे पे,

आंखों में , मुसकुराहट में,
व्यवहार में दिख ही जाता हैं..

प्रेम को दर्शाने की जरूरत नही पड़ती…

हमको पता होता है कि,
कौन हमसे #प्रेम करता है,
एक एहसास के सिवा,
और क्या है #प्रेम

Photo by manu mangalassery on Pexels.com
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अपना कोई कोना..

अब चाह नही अपने कोने की,

कुछ पाने की,कुछ खोने की,

मोह पाश सब टूट चुका अब,

दुनियां पीछे छूट चुका अब,

अब अपना कोना,

अपने अंदरजब से मन ये हुआ कलंदर…

अब चाह नही अपने कोने की,

कुछ पाने की,

कुछ खोने की।

Photo by Julia M Cameron on Pexels.com
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तुम कब खुश हुए…

कैसे खुश होंगे तुम,

इंसान जो हो..

तुम्हें तो आदत है ना,

जो नही है वो मांगने की,

जो है उसमें तुम कब खुश हुए,

जो मिलता है वो तुम्हें चाहिए नही,

जो मिला नही उसके लिए तुम ,

जान लगा दोगे..

धन्य हो तुम,

हे मानव!

Photo by rebcenter moscow on Pexels.com
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आंखें..

पहले मैं सुन लेता था आंखों को,
अब आंखों ने बातें करना छोड़ दिया…

लड़ती थी, शरमाती थी झुक जाती थी,
अब आंखों ने झुकना लजाना छोड़ दिया।

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जिंदगी ऐसी भी होती है…

जिंदगी ऐसी भी होती है,
वैसी भी होती है,
जितनें लोग
जितनें पल
जितनी जगहें,
जितनी सोच,
जितना नज़रिया
जितने सपनें,
जितनी सफलता,
जितनी हार,
जितनी नफरतें,
जितना प्यार,
जितनी गरीबी
जितना अत्याचार,
जितनी अव्यवस्था,
जितनी सरकार,

ये जितने , जितने है
जिंदगी उस हर
जगह है….
उतने रंग है जिंदगी के….
सब जी लो,
बिना शिकवा
बिना शिकायत..

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मैं कुछ कहना चाहता हूँ..

हम कुछ भी नहीं,
जो हैं, जैसे हैं, जहाँ हैं,
सबकी वजह
वह एक शख्स हैं,
जिसे हम पापा कहते हैं,
जिसने हमे बनाने में
खुद के सपने
इच्छाये,
ऐसो आराम,
सब एक तरफ
रख दिए।

शब्दों की कमी पड़ जाती है
जब मैं कुछ लिखना, बोलना चाहता हूँ,

बस यही कहकर विराम देता हूँ…

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शहर का वो कोना…

हर शहर में वो एक कोना होता है जो बिल्कुल शांत,निर्जन और एडवेंचरस होता है, ऐसे कोने ढूंढना अच्छा लगता है मुझे।
करनाल में ऐसे कई कोने है,ये एक ऐसा शहर है जिसे मैंने पैदल और सायकिल से एक्सप्लोर किया है।
ऐसे ही किसी जगह पे बैठा लिख रहा हूँ, पीछे की तरफ नहर है जो अभी सूखी हैं, बाई तरफ रेलवे का पुल जो नहर को क्रॉस करते हुए किसी और दुनिया की तरफ बढ़ जाता है। दाई तरफ़ नहर जा रही किसी अपने के तलाश में सुदूर, समानांतर में एक छोटी सड़क ,सड़क के बगल में खेत और असीम शांति।
20 किलोमीटर की साइक्लिंग के बाद यहां बैठकर इसे खुले वातारण को मैं अपने अंदर उतार चुका हूँ या कहो मैं विलीन हो गया हूँ इसमे।
शांति की भी अपनी आवाज होती है, बिना किसी आवाज के।चिड़ियो की बोली, पेडों के पत्तों का आपस मे टकराकर तड़तड़ाना, हवा की सन-सन ये सब मिलकर कुदरत का संगीत बनाते है ।
शुभप्रभात💐

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अशीर्षक…

क्या उम्मीदें थी उसे ज़िंदगी से?
क्या प्यास थी?
क्या नही था उसके पास?
रंग,रूप,सेहत,दौलत…शख्शियत
ये कौन सी टीस है,
जो आत्महत्या तक ले जाती है?
वो कौन सी वजह है,
कितनी कीमती है,
की जिसके लिए जान दी जा सके..?
स्तब्ध… प्रश्नसूचक वाक्यों से घिर गया हूँ मैं सुशांत…
मिला तुम्हें जिसकी तलाश में तुमने,
लोक बदल दिए।

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यादों का कारवां..

मैं इक चलता – फिरता कारवां हूँ,
यादों का,
और कुछ भी तो नही मेरे पास,
यादों के सिवा,
हर पड़ाव से आगे निकल जाता हूँ,
हर बार खाली होते हैं मेरे हाथ,
कुछ भी तो सँजो नही पाया,
पूंजी के नाम पर,
बस यादें..
कुछ ठहाकों भरी,
कुछ आहें..
कुछ छूटी मन्ज़िले,
कुछ बिसरी राहें,
यादों का कारवां ही तो हूँ मैं..
हमेशा रहूँगा तुम्हारी यादों में,
कभी आंसू बनकर,
कभी आह बनकर,
यादों का कारवां ही तो हूँ मैं।

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मैं प्रेम में हूँ…

सिर्फ सभ्यता और व्यवस्था के बंधन के कारण तुम्हारे साथ हूँ,

ऐसा नही है….

एक अनजाना सा लगाव है..

जो तुमसे दूर जाने ही नही देता..

तुम इसे प्रेम जैसा कुछ कहना चाहो,

तो मैं तुम्हे सभ्यता के बंधनों से,

मुक्त करता हूँ..

मैं प्रेम में हूँ…

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माँ

कुछ रिश्तों पे,
कुछ भी लिख लेता हूँ,
तुम पर लिखना
जैसे पूरी एक दुनियां लिखनी हो,
छोड़ देता हूँ,
तुमको लिखता नही,
जीता हूँ,
तुम जीवन हो,
माँ…

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अपने…

अपने वे नही जो, रोने के बाद आते हैं,
अपने वे होते हैं ,जो रोने नही देते ।

दोस्त वो नही जो गिरने के बाद आते हैं,
दोस्त वो हैं जो गिरने नही देते….

ठीक वैसे ही जैसे –

सपने वे नही जो सोने के बाद आते हैं,
सपने वे होते है जो सोने नही देते..

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Through of the moment – 7

आज जब वो इस दुनियां में नही हैं तो उसके लिए ग़ज़ल लिखे जा रहे, कविताएं, पोट्रेट, अच्छी – अच्छी बातें बोली जा रही।जब वो था तो किसी ने उस पर ग़ज़ल नही लिखी।

तारीफें की जा रही हैं कि वाह भाई क्या कमाल का आदमी था, कितनी खूबियां थी।

क्या तारीफें मरने की मोहताज होती हैं, अच्छी बातें मरने के बाद ज्यादा बोली जाती है…

पर सच बताऊँ, क्या फायदा उन तारीफ़ों का , ग़ज़लों का, कविताओं का जो जिसके लिए लिखी गयी वो ही नही सुन सकता, वो ही नही पढ़ सकता। आपस में सुनते रहो लाइक्स,शेयर दबाते रहो, वाह वाह करते रहो।

जो करना है तारीफ़ या बुराई अभी कर लो अभी जिंदा हूँ मैं। अभी कर लो।।

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