आत्मबल

सुनो!ये जो तुम हवा की दिशा में बह रहे हो,लक्ष्यहीन,सोचते हो बहुत बेफिक्रे हो,कूल और फैसिनेटिंग हो,रुको! सोचो..कही तुम्हारे अंदर उसकी कमी तो नही?हा वही

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लिखूंगा प्रेम भी …

लिखूंगा प्रेम भी लिखूंगा,पहले इन बहती आँखों के,आंसू तो लिख लूँ….जिस ओर देखता हूँ मुझको,बहती आंखे दिख जाती है,चीखें, आहें, रूदन, सिसकी,अब मानवता शर्माती है…

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मैं जानता हूं तुम्हे…

तुम कह सकती हो,तुम क्या समझोगे,पर मैं तुम्हे समझता हूं,मैं तब से तुम्हे,समझता हूं,जब मैं “मैं” बन रहा था…बल्कि मैंने,दुनिया को,तुमको,सबको,सिर्फ तुम्हारी,नजर से,देखा,जाना,समझा,उन नौ महीनों

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कहानी-3 “अनुपमा गाँगुली का चौथा प्यार” — “The Urban ऋषि”

https://anchor.fm/s/2065cce4/podcast/rss Summary अनुपमा गांगुली का चौथा प्यार पुस्तक से शीर्षक कहानी। Transcription कहानी-3 “अनुपमा गाँगुली का चौथा प्यार” — “The Urban ऋषि”

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संबल..

सम्बल का मतलब तब समझ आया,जब खुद को उसकी तलब लगी थी,बड़ी मुश्किल से मिला था,पर जब मिला तो,आंखों से मोती बन टपक पड़ा,अब मैं

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गलतफहमी…

कुछ करते रहने की इतनी बुरी आदत है मुझे,की कुछ भी करता रहता हूँ,कोई काम ना भी हो तो बिजी रहता हूँ,क्यो?क्योकि बिजी रहने की

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अधूरी दास्तां…

एक पूरी ज़िंदगी मे,होते है कई अधूरे दास्ताँ,जैसे बूंद-बूंद से बनता है समंदर,जैसे राई-राई से बनता है पहाड़,वैसे ही कई अधूरी दास्तानों से मिलकर,बनती है

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ख़्वाब देखा करो..

मैंने पूछा,थकते नही तुम?ना दिन देखते हो,ना रात,ना ही तुम ऊबते हो,ना शिकायत करते हो,एक समय मे इतने काम,ऊफ़,क्या राज है तुम्हारी ज़िंदादिली का…? उसने

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