लिखूंगा प्रेम भी …

लिखूंगा प्रेम भी लिखूंगा,पहले इन बहती आँखों के,आंसू तो लिख लूँ….जिस ओर देखता हूँ मुझको,बहती आंखे दिख जाती है,चीखें, आहें, रूदन, सिसकी,अब मानवता शर्माती है…

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मैं जानता हूं तुम्हे…

तुम कह सकती हो,तुम क्या समझोगे,पर मैं तुम्हे समझता हूं,मैं तब से तुम्हे,समझता हूं,जब मैं “मैं” बन रहा था…बल्कि मैंने,दुनिया को,तुमको,सबको,सिर्फ तुम्हारी,नजर से,देखा,जाना,समझा,उन नौ महीनों

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