अधूरी दास्तां…

एक पूरी ज़िंदगी मे,होते है कई अधूरे दास्ताँ,जैसे बूंद-बूंद से बनता है समंदर,जैसे राई-राई से बनता है पहाड़,वैसे ही कई अधूरी दास्तानों से मिलकर,बनती है इक पूरी ज़िंदगी,अधूरापन पूर्णता के मार्ग पर,एक पड़ाव मात्र है,और पड़ाव कभी गंतव्य नही होते,पर गंतव्य तक का सफर पड़ावों के बिना अधूरी दास्ताँ है।।

पर्यावरण की रक्षा..

बाथ टब के बाद उसने शावर लिया,और अपनी AC कार से,वो शोशल वर्कशाप पे पहुँचा…गज़ब की ओज़ थी उसकी वाणी में..पर्यावरण पे क्या बोलता था वो,पानी बचाने से लेकर ,ओज़ोन पर्त तक…सब उसकी व्याख्यान जिंदा थे..उसने दो पेड़ भी लगाये,भाषण भी दिया,और घर जाकर फिरHot water टब में,उसने विश्राम किया…थक चुका था वो,समाज सेवा इतना... Continue Reading →

ख़्वाब देखा करो..

मैंने पूछा,थकते नही तुम?ना दिन देखते हो,ना रात,ना ही तुम ऊबते हो,ना शिकायत करते हो,एक समय मे इतने काम,ऊफ़,क्या राज है तुम्हारी ज़िंदादिली का…? उसने कहाँ,ख़्वाब देखा करो,नींद,भूख,थकान ,ऊबन,सब छूमंतर हो जाएंगे…किसी सिद्ध पुरूष ने कहाँ है,ख़्वाब वो नही होते,जो सोने के बाद आते है,ख़्वाब वो होते है,जो सोने नही देते….

रिटायरमेंट..

सबको नही मिलती,'रिटायरमेंट'हम रोज कुआं खोदते है,रोज पानी पीते है…इकट्ठा कर सके कल के लिए,इतना मयस्सर ना हुआ,अब तो अच्छा लगता है…मेहनतकशीं भी एक लत होती है,अब काम ना हो तो,खुद को चिकोटी काट कर चेक करता हूँ,मैं ठीक तो हूँ ना,खुद से वादा जो किया था,कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छत समाः।

खुद को लिख ना पाया..

जब भी मैंने दिल से लिखा,कोई समझ ना पाया,जब भी मैने तुमको लिखा,तुम्हे समझ ना आया,जब भी मैने खुद को लिखा,खुद को लिख ना पाया..

खालीपन..

खालीपन की कोई दवा तो होती होगी,पंचामृत से मधुशाला तक,सब आज़माया मैनें…. अब तक खाली… रिक्त जगह ये कभी तो भरती होगी,जिया है मैनें,झोपड़पट्टी से,पांच सितारा… फिर भी खाली… खालीपन की कोई दवा तो होती होगी…

कितनी महंगी कविताएं है…

कितनी महंगी है कवितायें,कैसे तुमको समझाऊ…कितनी इसमें मधुशाला है,कितनी जागी रातें..कितनी आहत भाव है इसमें,कितनी अनकही बातें,मोल नही मिलती है आहें,मोल ना मिलती बाहें…कितनी महंगी कविताएं है…

जीवन कैसे जीते है..

सुबह जो मुझे जोश से लबरेज़ देखते हैं,वो ही मुझे शाम को खामोश देखते हैं..एक ही दिन में कितने रंग मैं दिखला देता हूं,जीवन कैसे जीते है ये सिखला देता हूँ…

अहसास…

सोचता हूँ सब लिख दू,फिर छोड़ देता हूँ..बहुतों ने है जितना लिखा,मैं उतना छोड़ देता हूँ,उन्हें भी दर्द लिखने का,जरा महसूस तो हो ले,मैं कुछ अहसास उन लोगो,के लिए छोड़ देता हूँ…

नासमझ..

याद है तुम्हें,तुमने कहा था,की मैं नासमझ हूँ,कितनी सच थी ना तुम..देखो!मैं आज भी समझ नही पाया,'खुद' को..सच ..नासमझ हूँ मैं…

अपना कोई कोना-२

इस धरनी के बृहद परिधि से, दूर गगन के अनंत क्षितिज तक, कौन सा कोना..? मुक्त भाव से सब कुछ मेरा, मैं सबका हूँ,कैसा कोना, कौन सा कोना..? बस सब मन की अभिलाषा है, स्वयं बनाई परिभाषा है, फिर काहे को, कैसा रोना, खुला आसमां, क्षितिज समंदर, वृक्ष तले ही अपना कोना... Photo by Pixabay... Continue Reading →

कठपुतली..

धीरे-धीरे उसे कठपुतली बनाया गया, वो जंगल का शेर था, उसे सर्कस के काबिल बनाया गया, बंदर हो ,भालू हो, चाहे हो मछली, पेड़ पे चढ़ना सिखाया गया, बरसों बरस तक पढ़ाया गया, शीशें में उनको उतारा गया, होना तो यूँ था,की खुद में उतरते, खुदी को समझते,नई दुनियां रचते, मगर उनको बाबू बनाया गया,... Continue Reading →

मौन

सब कुछ लिखा नही जा सकता,असहायता की भाषा मौन होती है..बहुत से अहसास शब्दों से परे है,चाहे वो नितांत सुख की अनुभूति हो,निःस्वार्थ प्रेम हो,या किसी अपने का चले जाना,कलम हमेशा असहाय ही रही,दुख बांटा नही जा सकता,यह एक नितांत व्यक्तिगत विषय है।

जरूरी है क्या?

प्रेम करना और बोलना, जरूरी है क्या,जब लोगो ने #प्रेम को,बोलना शुरू किया, प्रेम फीका होता चला गया, वो क्या #प्रेम ,जिसे जताना पड़े,करता हूँ मैं तुमसे ,बताना पड़े, प्रेम तो बस चेहरे पे, आंखों में , मुसकुराहट में,व्यवहार में दिख ही जाता हैं.. प्रेम को दर्शाने की जरूरत नही पड़ती… हमको पता होता है... Continue Reading →

अपना कोई कोना..

अब चाह नही अपने कोने की, कुछ पाने की,कुछ खोने की, मोह पाश सब टूट चुका अब, दुनियां पीछे छूट चुका अब, अब अपना कोना, अपने अंदरजब से मन ये हुआ कलंदर... अब चाह नही अपने कोने की, कुछ पाने की, कुछ खोने की। Photo by Julia M Cameron on Pexels.com

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