Uncategorized

गलतफहमी…

कुछ करते रहने की इतनी बुरी आदत है मुझे,
की कुछ भी करता रहता हूँ,
कोई काम ना भी हो तो बिजी रहता हूँ,
क्यो?
क्योकि बिजी रहने की गलतफहमी है मुझे,
मेरे क्रियाकलापों के हिसाब से अगर दिन रात,
12 घंटे के भी होते तो कोई खास फर्क ना पड़ता
कल ही मैं खुद से पूछ रहा था कि करता क्या हूँ मैं?

हमेशा बिजी रहता हूं और काम भी सारे पड़े रहते है… कुछ तो गलतफहमी है।

Standard
Uncategorized

हाय रे लत!

हाय रे लत!

आज घड़ी,घर छोड़ आया हूं,

ऐसा लग रहा,

शरीर का कोई हिस्सा छोड़ आया हूँ,

तुम पूछती हो ना,

तुम मेरे लिए क्या हो,

कुछ ऐसा ही महसूस होता है,

जब तुम नही होती,

तो क्या अब मैं तुम्हे लत कहूँ…

क्या कहूँ ?

Photo by ritonn.photo on Pexels.com
Standard
Uncategorized

🪔 शुभ दीपावली 🪔

आप सभी पाठकों एवं मित्रों को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाए, बधाई । 🎉। इस खुशी,हर्ष, उल्लास मे एक एक बात याद रखिएगा, खुशियां बांटने से बढ़ती है।

इस नकारात्मक और कठिन समय मे बहुत से भाई बंधु शायद ही अपने परिवारों को आवश्यक वस्तुए उपलब्ध करा पाए, अपने आस पास नजर रखे और जितना हो सके लोगों की मदद करे क्योंकि जो आप बाटते हो वो दस गुना हो वापस लौटता है।

अंत मे एक बात फिर से –

याद रखिएगा, खुशियां बांटने से बढ़ती है।।

हैप्पी दिवाली 🪔

Photo by Dhivakaran S on Pexels.com
Standard
Uncategorized

शतरंज की बाज़ी…

ये किस उधेड़बुन में उलझा रही हो मुझे,
कभी दो कदम आगे,
तो कभी ढाई कदम पीछे,
क्यो जीवन को ‘शतरंज की बाजी’
बना रही हो तुम,
चलो तुम जीती,मैं हार जाता हूँ,
तुम अपनी जिद वही रखो,
मैं अपना सर झुकाता हूँ,
कभी तो हाथ मे मेरी, तुम अपना हाथ भी दे दो,
कदम संग- संग बढ़ाओ,
थोड़ी दूरी साथ तो दे दो…
चलो कोई ऐसा चाल जिसमे,
तुम हारो ना मैं हारु..
चलो शतरंज की हम इक नई बाज़ी बनाते है..

Standard
Uncategorized

क्या लिखूँ बसंत मैं..

क्या लिखूँ बसंत मैं,

पत्थरों के जंगलों में,

वातानुकूलित कमरों में बैठा,

क्या लिखूँ बसंत मैं….

ना पत्तों को झड़ते देखा,

ना नवअंकुर लगते,

क्या लिखूँ बसंत मैं…

Photo by Pixabay on Pexels.com
Standard
Uncategorized

अधूरी दास्तां…

एक पूरी ज़िंदगी मे,
होते है कई अधूरे दास्ताँ,
जैसे बूंद-बूंद से बनता है समंदर,
जैसे राई-राई से बनता है पहाड़,
वैसे ही कई अधूरी दास्तानों से मिलकर,
बनती है इक पूरी ज़िंदगी,
अधूरापन पूर्णता के मार्ग पर,
एक पड़ाव मात्र है,
और पड़ाव कभी गंतव्य नही होते,
पर गंतव्य तक का सफर पड़ावों के बिना अधूरी दास्ताँ है।।

Standard
Uncategorized

पर्यावरण की रक्षा..

बाथ टब के बाद उसने शावर लिया,
और अपनी AC कार से,
वो शोशल वर्कशाप पे पहुँचा…
गज़ब की ओज़ थी उसकी वाणी में..
पर्यावरण पे क्या बोलता था वो,
पानी बचाने से लेकर ,
ओज़ोन पर्त तक…
सब उसकी व्याख्यान जिंदा थे..
उसने दो पेड़ भी लगाये,
भाषण भी दिया,
और घर जाकर फिर
Hot water टब में,
उसने विश्राम किया…
थक चुका था वो,
समाज सेवा इतना आसान काम भी नही था…..
आखिर पर्यावरण की रक्षा के लिए,
वो कुछ भी कर सकता था…

Photo by Alena Koval on Pexels.com

Standard
Uncategorized

ख़्वाब देखा करो..

मैंने पूछा,
थकते नही तुम?
ना दिन देखते हो,
ना रात,
ना ही तुम ऊबते हो,
ना शिकायत करते हो,
एक समय मे इतने काम,
ऊफ़,
क्या राज है तुम्हारी ज़िंदादिली का…?

उसने कहाँ,
ख़्वाब देखा करो,
नींद,भूख,थकान ,ऊबन,
सब छूमंतर हो जाएंगे…
किसी सिद्ध पुरूष ने कहाँ है,
ख़्वाब वो नही होते,
जो सोने के बाद आते है,
ख़्वाब वो होते है,
जो सोने नही देते….

Standard
Uncategorized

रिटायरमेंट..

सबको नही मिलती,
‘रिटायरमेंट’
हम रोज कुआं खोदते है,
रोज पानी पीते है…
इकट्ठा कर सके कल के लिए,
इतना मयस्सर ना हुआ,
अब तो अच्छा लगता है…
मेहनतकशीं भी एक लत होती है,
अब काम ना हो तो,
खुद को चिकोटी काट कर चेक करता हूँ,
मैं ठीक तो हूँ ना,
खुद से वादा जो किया था,
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छत समाः।

Standard
Uncategorized

खालीपन..

खालीपन की कोई दवा तो होती होगी,
पंचामृत से मधुशाला तक,
सब आज़माया मैनें….

अब तक खाली…

रिक्त जगह ये कभी तो भरती होगी,
जिया है मैनें,
झोपड़पट्टी से,
पांच सितारा…

फिर भी खाली…

खालीपन की कोई दवा तो होती होगी…

Standard
Uncategorized

कितनी महंगी कविताएं है…

कितनी महंगी है कवितायें,
कैसे तुमको समझाऊ…
कितनी इसमें मधुशाला है,
कितनी जागी रातें..
कितनी आहत भाव है इसमें,
कितनी अनकही बातें,
मोल नही मिलती है आहें,
मोल ना मिलती बाहें…
कितनी महंगी कविताएं है…

Standard
Uncategorized

जीवन कैसे जीते है..

सुबह जो मुझे जोश से लबरेज़ देखते हैं,
वो ही मुझे शाम को खामोश देखते हैं..
एक ही दिन में कितने रंग मैं दिखला देता हूं,
जीवन कैसे जीते है ये सिखला देता हूँ…

Standard
Uncategorized

अहसास…

सोचता हूँ सब लिख दू,
फिर छोड़ देता हूँ..
बहुतों ने है जितना लिखा,
मैं उतना छोड़ देता हूँ,
उन्हें भी दर्द लिखने का,
जरा महसूस तो हो ले,
मैं कुछ अहसास उन लोगो,
के लिए छोड़ देता हूँ…

Standard