कहानी-3 “अनुपमा गाँगुली का चौथा प्यार” — “The Urban ऋषि”

https://anchor.fm/s/2065cce4/podcast/rss Summary अनुपमा गांगुली का चौथा प्यार पुस्तक से शीर्षक कहानी। Transcription कहानी-3 “अनुपमा गाँगुली का चौथा प्यार” — “The Urban ऋषि”

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संबल..

सम्बल का मतलब तब समझ आया,जब खुद को उसकी तलब लगी थी,बड़ी मुश्किल से मिला था,पर जब मिला तो,आंखों से मोती बन टपक पड़ा,अब मैं

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गलतफहमी…

कुछ करते रहने की इतनी बुरी आदत है मुझे,की कुछ भी करता रहता हूँ,कोई काम ना भी हो तो बिजी रहता हूँ,क्यो?क्योकि बिजी रहने की

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अधूरी दास्तां…

एक पूरी ज़िंदगी मे,होते है कई अधूरे दास्ताँ,जैसे बूंद-बूंद से बनता है समंदर,जैसे राई-राई से बनता है पहाड़,वैसे ही कई अधूरी दास्तानों से मिलकर,बनती है

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ख़्वाब देखा करो..

मैंने पूछा,थकते नही तुम?ना दिन देखते हो,ना रात,ना ही तुम ऊबते हो,ना शिकायत करते हो,एक समय मे इतने काम,ऊफ़,क्या राज है तुम्हारी ज़िंदादिली का…? उसने

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रिटायरमेंट..

सबको नही मिलती,‘रिटायरमेंट’हम रोज कुआं खोदते है,रोज पानी पीते है…इकट्ठा कर सके कल के लिए,इतना मयस्सर ना हुआ,अब तो अच्छा लगता है…मेहनतकशीं भी एक लत

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खालीपन..

खालीपन की कोई दवा तो होती होगी,पंचामृत से मधुशाला तक,सब आज़माया मैनें…. अब तक खाली… रिक्त जगह ये कभी तो भरती होगी,जिया है मैनें,झोपड़पट्टी से,पांच

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कितनी महंगी कविताएं है…

कितनी महंगी है कवितायें,कैसे तुमको समझाऊ…कितनी इसमें मधुशाला है,कितनी जागी रातें..कितनी आहत भाव है इसमें,कितनी अनकही बातें,मोल नही मिलती है आहें,मोल ना मिलती बाहें…कितनी महंगी

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अहसास…

सोचता हूँ सब लिख दू,फिर छोड़ देता हूँ..बहुतों ने है जितना लिखा,मैं उतना छोड़ देता हूँ,उन्हें भी दर्द लिखने का,जरा महसूस तो हो ले,मैं कुछ

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