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शतरंज की बाज़ी…

ये किस उधेड़बुन में उलझा रही हो मुझे,
कभी दो कदम आगे,
तो कभी ढाई कदम पीछे,
क्यो जीवन को ‘शतरंज की बाजी’
बना रही हो तुम,
चलो तुम जीती,मैं हार जाता हूँ,
तुम अपनी जिद वही रखो,
मैं अपना सर झुकाता हूँ,
कभी तो हाथ मे मेरी, तुम अपना हाथ भी दे दो,
कदम संग- संग बढ़ाओ,
थोड़ी दूरी साथ तो दे दो…
चलो कोई ऐसा चाल जिसमे,
तुम हारो ना मैं हारु..
चलो शतरंज की हम इक नई बाज़ी बनाते है..

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क्या लिखूँ बसंत मैं..

क्या लिखूँ बसंत मैं,

पत्थरों के जंगलों में,

वातानुकूलित कमरों में बैठा,

क्या लिखूँ बसंत मैं….

ना पत्तों को झड़ते देखा,

ना नवअंकुर लगते,

क्या लिखूँ बसंत मैं…

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अधूरी दास्तां…

एक पूरी ज़िंदगी मे,
होते है कई अधूरे दास्ताँ,
जैसे बूंद-बूंद से बनता है समंदर,
जैसे राई-राई से बनता है पहाड़,
वैसे ही कई अधूरी दास्तानों से मिलकर,
बनती है इक पूरी ज़िंदगी,
अधूरापन पूर्णता के मार्ग पर,
एक पड़ाव मात्र है,
और पड़ाव कभी गंतव्य नही होते,
पर गंतव्य तक का सफर पड़ावों के बिना अधूरी दास्ताँ है।।

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पर्यावरण की रक्षा..

बाथ टब के बाद उसने शावर लिया,
और अपनी AC कार से,
वो शोशल वर्कशाप पे पहुँचा…
गज़ब की ओज़ थी उसकी वाणी में..
पर्यावरण पे क्या बोलता था वो,
पानी बचाने से लेकर ,
ओज़ोन पर्त तक…
सब उसकी व्याख्यान जिंदा थे..
उसने दो पेड़ भी लगाये,
भाषण भी दिया,
और घर जाकर फिर
Hot water टब में,
उसने विश्राम किया…
थक चुका था वो,
समाज सेवा इतना आसान काम भी नही था…..
आखिर पर्यावरण की रक्षा के लिए,
वो कुछ भी कर सकता था…

Photo by Alena Koval on Pexels.com

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ख़्वाब देखा करो..

मैंने पूछा,
थकते नही तुम?
ना दिन देखते हो,
ना रात,
ना ही तुम ऊबते हो,
ना शिकायत करते हो,
एक समय मे इतने काम,
ऊफ़,
क्या राज है तुम्हारी ज़िंदादिली का…?

उसने कहाँ,
ख़्वाब देखा करो,
नींद,भूख,थकान ,ऊबन,
सब छूमंतर हो जाएंगे…
किसी सिद्ध पुरूष ने कहाँ है,
ख़्वाब वो नही होते,
जो सोने के बाद आते है,
ख़्वाब वो होते है,
जो सोने नही देते….

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रिटायरमेंट..

सबको नही मिलती,
‘रिटायरमेंट’
हम रोज कुआं खोदते है,
रोज पानी पीते है…
इकट्ठा कर सके कल के लिए,
इतना मयस्सर ना हुआ,
अब तो अच्छा लगता है…
मेहनतकशीं भी एक लत होती है,
अब काम ना हो तो,
खुद को चिकोटी काट कर चेक करता हूँ,
मैं ठीक तो हूँ ना,
खुद से वादा जो किया था,
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छत समाः।

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खालीपन..

खालीपन की कोई दवा तो होती होगी,
पंचामृत से मधुशाला तक,
सब आज़माया मैनें….

अब तक खाली…

रिक्त जगह ये कभी तो भरती होगी,
जिया है मैनें,
झोपड़पट्टी से,
पांच सितारा…

फिर भी खाली…

खालीपन की कोई दवा तो होती होगी…

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कितनी महंगी कविताएं है…

कितनी महंगी है कवितायें,
कैसे तुमको समझाऊ…
कितनी इसमें मधुशाला है,
कितनी जागी रातें..
कितनी आहत भाव है इसमें,
कितनी अनकही बातें,
मोल नही मिलती है आहें,
मोल ना मिलती बाहें…
कितनी महंगी कविताएं है…

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जीवन कैसे जीते है..

सुबह जो मुझे जोश से लबरेज़ देखते हैं,
वो ही मुझे शाम को खामोश देखते हैं..
एक ही दिन में कितने रंग मैं दिखला देता हूं,
जीवन कैसे जीते है ये सिखला देता हूँ…

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अहसास…

सोचता हूँ सब लिख दू,
फिर छोड़ देता हूँ..
बहुतों ने है जितना लिखा,
मैं उतना छोड़ देता हूँ,
उन्हें भी दर्द लिखने का,
जरा महसूस तो हो ले,
मैं कुछ अहसास उन लोगो,
के लिए छोड़ देता हूँ…

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अपना कोई कोना-२

इस धरनी के बृहद परिधि से,

दूर गगन के अनंत क्षितिज तक,

कौन सा कोना..?

मुक्त भाव से सब कुछ मेरा,

मैं सबका हूँ,कैसा कोना,

कौन सा कोना..?

बस सब मन की अभिलाषा है,

स्वयं बनाई परिभाषा है,

फिर काहे को, कैसा रोना,

खुला आसमां,

क्षितिज समंदर,

वृक्ष तले ही अपना कोना…🙏

Photo by Pixabay on Pexels.com
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कठपुतली..

धीरे-धीरे उसे कठपुतली बनाया गया,

वो जंगल का शेर था,

उसे सर्कस के काबिल बनाया गया,

बंदर हो ,भालू हो, चाहे हो मछली,

पेड़ पे चढ़ना सिखाया गया,

बरसों बरस तक पढ़ाया गया,

शीशें में उनको उतारा गया,

होना तो यूँ था,की खुद में उतरते,

खुदी को समझते,नई दुनियां रचते,

मगर उनको बाबू बनाया गया,

बरसों बरस तक पढ़ाया गया,

शासन के हाथों नचाया गया,

कठपुतली ऐसे बनाया गया।

Photo by Min Thein on Pexels.com
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मौन

सब कुछ लिखा नही जा सकता,
असहायता की भाषा मौन होती है..
बहुत से अहसास शब्दों से परे है,
चाहे वो नितांत सुख की अनुभूति हो,
निःस्वार्थ प्रेम हो,
या किसी अपने का चले जाना,
कलम हमेशा असहाय ही रही,
दुख बांटा नही जा सकता,
यह एक नितांत व्यक्तिगत विषय है।

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